क्यों रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया भारतीय (INR) रुपया?

आम भारतीय और मिडिल क्लास के लिए इसका क्या मतलब है

पिछले कुछ दिनों से अख़बारों और न्यूज़ ऐप्स में एक खबर लगातार सुर्खियों में है—भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। 91 या 91.70 रुपये प्रति डॉलर जैसे आंकड़े सुनकर आम आदमी के मन में स्वाभाविक चिंता पैदा होती है। लेकिन इस गिरावट के पीछे क्या वजह है, और इसका असर हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कैसे पड़ता है, इसे आसान भाषा में समझना ज़रूरी है।

सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी डॉलर का मज़बूत होना। जब अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहती हैं, तो दुनियाभर के निवेशक वहां निवेश करना ज़्यादा सुरक्षित और फायदेमंद मानते हैं। ऐसे में वे भारत जैसे देशों से पैसा निकालकर अमेरिका की ओर ले जाते हैं। इससे भारत में डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर हो जाता है। इसे ऐसे समझिए—जब किसी चीज़ की मांग ज़्यादा और आपूर्ति कम हो, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है। डॉलर के साथ भी यही हो रहा है।

दूसरी अहम वजह है वैश्विक अस्थिरता। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता निवेशकों को सतर्क बना देती है। ऐसे माहौल में वे जोखिम से बचने के लिए सुरक्षित मुद्राओं की ओर भागते हैं, और डॉलर को सबसे सुरक्षित माना जाता है। इसका सीधा असर रुपये जैसी मुद्राओं पर पड़ता है। इसके साथ ही कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी रुपये पर दबाव बनाती हैं, क्योंकि भारत अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल आयात करता है और इसके लिए डॉलर चुकाने पड़ते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका मिला-जुला असर होता है। कमजोर रुपया निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए फायदेमंद होता है, क्योंकि उन्हें विदेश से मिलने वाले डॉलर के बदले ज़्यादा रुपये मिलते हैं। लेकिन दूसरी ओर आयात महंगा हो जाता है। तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, दवाइयों का कच्चा माल—ये सब चीज़ें महंगी पड़ने लगती हैं। जब कंपनियों की लागत बढ़ती है, तो वे यह बोझ आम उपभोक्ताओं पर डालती हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है।

इस पूरे हालात का सबसे ज़्यादा असर मिडिल क्लास पर महसूस होता है। पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ने से ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, जिसका असर सब्ज़ियों से लेकर रोज़मर्रा की चीज़ों तक दिखता है। मोबाइल, लैपटॉप, कार या AC जैसी चीज़ें खरीदना महंगा हो सकता है। विदेश यात्रा, बच्चों की विदेशी पढ़ाई या डॉलर से जुड़ी कोई भी योजना पहले से ज़्यादा खर्चीली लगने लगती है। आमदनी वही रहती है, लेकिन खर्च धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

हालांकि स्थिति पूरी तरह बेकाबू नहीं है। Reserve Bank of India बाज़ार में हस्तक्षेप कर रुपये की तेज़ गिरावट को रोकने की कोशिश करता है, ताकि झटका बहुत ज़्यादा न लगे। भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद भी इतनी मजबूत है कि ऐसी गिरावट को झेला जा सके, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी पर इसका असर नहीं पड़ता।

निष्कर्ष यही है कि रुपये का गिरना सिर्फ़ एक आर्थिक खबर नहीं, बल्कि हर मिडिल क्लास परिवार की जेब से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे समय में समझदारी इसी में है कि खर्चों पर नियंत्रण रखा जाए, गैर-ज़रूरी चीज़ों को टाला जाए और लंबी अवधि की योजना के साथ पैसे का इस्तेमाल किया जाए। क्योंकि आखिरकार, बड़े आर्थिक आंकड़ों के पीछे छिपी असली कहानी आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही दिखाई देती है।

Blog By Zapkit.org


Posted

in

by

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *