ट्रंप का ग्रीनलैंड बयान और इतिहास के भूले-बिसरे सौदे
जब हाल ही में Donald Trump ने ग्रीनलैंड को “खरीदने” की बात दोहराई, तो पूरी दुनिया में हलचल मच गई। सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ने लगे, राजनीतिक बहस छिड़ गई और आम लोगों के मन में एक पुराना लेकिन बेहद रोचक सवाल फिर से जाग उठा—क्या आज के समय में कोई देश सचमुच किसी दूसरे देश या इलाके को खरीद सकता है? यह सवाल जितना अजीब लगता है, उतना ही गहरा और ऐतिहासिक भी है।
ग्रीनलैंड, जो भौगोलिक रूप से दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, औपचारिक रूप से Denmark का एक स्वायत्त क्षेत्र है। यहां की अपनी स्थानीय सरकार है और आंतरिक मामलों में इसे काफी स्वतंत्रता प्राप्त है। ट्रंप के अनुसार ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है—खासकर आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, दुर्लभ खनिज संसाधनों और जलवायु परिवर्तन के कारण खुलते नए समुद्री रास्तों की वजह से। लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड—दोनों ने एक सुर में साफ कहा कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है, और न ही यह किसी सौदे की वस्तु है।”
असल में आज की दुनिया में किसी देश या क्षेत्र को खरीदने की कल्पना लगभग असंभव है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में संप्रभुता यानी किसी देश की स्वतंत्र पहचान और अधिकार सबसे ऊपर माने जाते हैं। United Nations का चार्टर भी यही कहता है कि किसी भी क्षेत्र का भविष्य वहां रहने वाले लोगों की इच्छा और सहमति से तय होगा। अब ज़मीन को सिर्फ नक्शे का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि वहां के लोगों, उनकी संस्कृति और उनके अधिकारों को भी उतनी ही अहमियत दी जाती है।
हालांकि, इतिहास के पन्ने पलटें तो तस्वीर बिल्कुल अलग नज़र आती है। एक समय ऐसा भी था जब ज़मीनों की खरीद-बिक्री बड़े सौदों की तरह होती थी। 1867 में United States ने Russia से अलास्का को मात्र 7.2 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। उस दौर में कई लोगों ने इसे “पैसों की बर्बादी” कहा, लेकिन बाद में अलास्का ने तेल, गैस और प्राकृतिक संसाधनों के ज़रिए इस सौदे को ऐतिहासिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित कर दिया।
इसी तरह 1803 में अमेरिका ने France से लुइसियाना क्षेत्र खरीदा। यह सौदा इतना विशाल था कि इससे अमेरिका का भौगोलिक आकार लगभग दोगुना हो गया। उस दौर में साम्राज्यवादी शक्तियां ज़मीन को संपत्ति की तरह देखती थीं—जिसे युद्ध, संधि या सीधे सौदे के ज़रिए हासिल किया जा सकता था। स्थानीय आबादी की राय या अधिकारों पर शायद ही कभी ध्यान दिया जाता था।
औपनिवेशिक युग में तो हालात और भी क्रूर थे। यूरोप की ताकतवर शक्तियां एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के विशाल इलाकों को आपस में बांट लेती थीं। कई बार नक्शों पर सीधी रेखाएं खींचकर सीमाएं तय कर दी जाती थीं, बिना यह सोचे कि वहां रहने वाले लोगों की भाषा, संस्कृति और पहचान क्या है। आज दुनिया के कई हिस्सों में जो सीमा विवाद और संघर्ष देखने को मिलते हैं, उनकी जड़ें उसी दौर में छिपी हैं।
समय बदला, दुनिया बदली। राजाओं और साम्राज्यों की जगह लोकतंत्र और राष्ट्र-राज्य आए। आज अगर कोई क्षेत्र अलग होने की मांग करता भी है, तो उसे जनमत संग्रह, संवैधानिक प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय मान्यता जैसे लंबे रास्तों से गुजरना पड़ता है। इसी संदर्भ में ट्रंप का ग्रीनलैंड वाला बयान एक व्यावहारिक प्रस्ताव से ज़्यादा राजनीतिक संदेश और रणनीतिक दबाव माना जाता है।
अंत में, यह पूरा विषय हमें एक बेहद मानवीय सच्चाई की याद दिलाता है—देश कोई ज़मीन का टुकड़ा नहीं होते जिन्हें खरीदा या बेचा जा सके। देश वहां रहने वाले लोगों से बनते हैं, उनकी इच्छाओं, सपनों और पहचान से बनते हैं। इतिहास में जो मुमकिन था, वह आज के लोकतांत्रिक और कानूनी विश्व में केवल बहस और सुर्खियों तक ही सीमित रह गया है।
by zapkit.org

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