अमेरिका का WHO से बाहर निकलना: क्या है WHO और इसका दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

हाल ही में खबर आई कि United States ने आधिकारिक रूप से World Health Organization यानी WHO से खुद को अलग कर लिया है। यह फैसला सिर्फ़ अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए इसके मायने हैं। ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि WHO क्या है, यह मानवता के लिए क्या करता है, और अमेरिका जैसे बड़े देश के बाहर निकलने से भारत जैसे देशों पर क्या असर पड़ सकता है।

WHO संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है, जिसकी स्थापना 1948 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है। जब कहीं महामारी फैलती है, नई बीमारी सामने आती है, या टीकाकरण जैसे बड़े अभियान चलाने होते हैं, तो WHO देशों को वैज्ञानिक सलाह, तकनीकी मदद और ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराता है। कोरोना महामारी के दौरान WHO का नाम हर किसी ने सुना, क्योंकि वही संस्था देशों को दिशा-निर्देश और जानकारी दे रही थी।

WHO की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह अमीर और गरीब देशों के बीच सेतु का काम करता है। अफ्रीका या एशिया के गरीब देशों में जब कोई बीमारी फैलती है, तो WHO वहां दवाइयों, वैक्सीन और मेडिकल विशेषज्ञों तक पहुंच बनाने में मदद करता है। टीबी, पोलियो, मलेरिया जैसी बीमारियों से लड़ने में WHO की भूमिका दशकों से अहम रही है। साफ शब्दों में कहें तो यह संस्था “बीमारी की नहीं, बचाव की लड़ाई” लड़ती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिका ने WHO से दूरी क्यों बनाई। अमेरिका का आरोप रहा है कि WHO कुछ मामलों में समय पर सख्त कदम नहीं उठा पाया और संगठन में सुधार की ज़रूरत है। इसके अलावा, फंडिंग और फैसलों को लेकर भी अमेरिका की असहमति सामने आती रही है। अमेरिका WHO का सबसे बड़ा वित्तीय योगदानकर्ता रहा है, इसलिए उसका मानना है कि उसकी बातों को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

लेकिन क्या WHO का हिस्सा रहना ज़रूरी है? ज़्यादातर देशों का मानना है कि हां। क्योंकि बीमारियां पासपोर्ट देखकर नहीं फैलतीं। आज की दुनिया में अगर किसी एक देश में स्वास्थ्य संकट पैदा होता है, तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में WHO जैसे वैश्विक मंच से अलग होना सहयोग की भावना को कमजोर करता है।

भारत जैसे देशों पर इसका असर अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण हो सकता है। India WHO के साथ मिलकर टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, और संक्रामक बीमारियों पर काम करता रहा है। अमेरिका के बाहर निकलने से WHO के पास फंड और संसाधनों की कमी हो सकती है, जिसका असर विकासशील देशों में चल रहे स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर पड़ सकता है। हालांकि भारत की अपनी स्वास्थ्य क्षमता मजबूत हो रही है, फिर भी वैश्विक सहयोग का महत्व कम नहीं होता।

अंत में, यह समझना ज़रूरी है कि WHO कोई परफेक्ट संस्था नहीं है, लेकिन यह दुनिया के लिए एक साझा मंच ज़रूर है। अमेरिका का बाहर निकलना एक राजनीतिक फैसला हो सकता है, लेकिन स्वास्थ्य के मामले में सहयोग से पीछे हटना पूरी मानवता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

स्वास्थ्य कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक जिम्मेदारी है।

Blog by zapkit.org

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *