भारत में बढ़ता प्रदूषण: हवा कितनी ज़हरीली हो चुकी है?

AQI, बड़े शहर और अगर अब नहीं चेते तो क्या होगा

भारत आज जिस सबसे गंभीर लेकिन चुपचाप बढ़ती समस्या से जूझ रहा है, वह है प्रदूषण, खासकर वायु प्रदूषण। हम इसे अक्सर सर्दियों की धुंध या “आज AQI बहुत खराब है” कहकर टाल देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि यह समस्या अब सिर्फ़ असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और भविष्य का संकट बन चुकी है।

AQI क्या है और यह क्यों ज़रूरी है?

AQI यानी Air Quality Index हवा की गुणवत्ता को मापने का पैमाना है।

  • 0–50: अच्छी हवा
  • 51–100: संतोषजनक
  • 101–200: खराब
  • 201–300: बहुत खराब
  • 300+: बेहद ख़तरनाक

जितना ज़्यादा AQI, उतनी ज़्यादा ज़हरीली हवा। अफ़सोस की बात यह है कि भारत के कई बड़े शहर अक्सर “खराब” या “बहुत खराब” श्रेणी में रहते हैं।

भारत के प्रमुख शहर और प्रदूषण

दिल्ली लंबे समय से दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है। इसके अलावा मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, पटना जैसे शहरों में भी AQI कई बार सुरक्षित सीमा से ऊपर चला जाता है। बढ़ते वाहन, निर्माण कार्य, फैक्ट्रियों का धुआं, कचरा जलाना और पराली—ये सभी मिलकर शहरों की हवा को धीरे-धीरे ज़हर बना रहे हैं।

हम क्या कदम उठा रहे हैं?

सरकार और प्रशासन स्तर पर कुछ प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं—जैसे BS-VI ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, ग्रीन एनर्जी, प्रदूषण नियंत्रण नियम और AQI मॉनिटरिंग। कुछ शहरों में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) भी लागू होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि ये कदम अभी समस्या की रफ्तार से पीछे चल रहे हैं।

अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो?

प्रदूषण का असर सिर्फ़ खांसी या आंखों में जलन तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक खराब हवा में सांस लेने से:

  • अस्थमा, फेफड़ों और दिल की बीमारियां बढ़ेंगी
  • बच्चों की फेफड़ों की ग्रोथ प्रभावित होगी
  • बुज़ुर्गों की उम्र और जीवन गुणवत्ता घटेगी
  • हेल्थकेयर खर्च तेजी से बढ़ेगा
  • काम करने की क्षमता और उत्पादकता कम होगी

सीधे शब्दों में कहें तो, अगर प्रदूषण नहीं रुका तो बीमार भारत बनने का खतरा है।

आम नागरिक की भूमिका

यह सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। कम दूरी के लिए गाड़ी की जगह पैदल चलना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल, कचरा न जलाना, पेड़ लगाना और ऊर्जा की बचत—ये छोटे कदम मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं। जब तक आम आदमी इसे अपनी समस्या नहीं मानेगा, तब तक कोई नीति पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।

निष्कर्ष

प्रदूषण कोई दूर की समस्या नहीं, यह हर सांस के साथ हमारे अंदर जा रहा है। AQI के नंबर सिर्फ़ आंकड़े नहीं, बल्कि हमारे भविष्य की चेतावनी हैं। सवाल यह नहीं है कि हवा कितनी खराब है, सवाल यह है कि हम कब तक इसे नज़रअंदाज़ करते रहेंगे

अगर आज हमने हवा को नहीं बचाया, तो कल सांस लेना भी एक लग्ज़री बन जाएगा।

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